अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र The Hindu के माह जुलाई 2019 विशिष्‍ट समाचारों व
संपादकीय लेखों (editorial) का  हिन्‍दी में अनुवाद

01-07-2019: New framework: on SEBI's norms for mutual fund investments

Courtesy and credit: https://www.thehindu.com/opinion/editorial/new-framework/article28236195.ece

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The SEBI regulations for mutual funds will help restore investor confidence

क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के लिए पिछले महीने एक नया मानक ढांचा पेश करने के बाद, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने म्यूचुअल फंड के प्रबंधन को संचालित करने के लिए नियमों को और अधिक कड़ा बनाने का निश्‍चय किया। पिछले कुछ महीनों में कुछ म्यूचुअल फंडों द्वारा अपनी निश्चित परिपक्वता योजनाओं (fixed maturity plans = FMPs) को भुनाने की अवधि को स्‍थगित के कारण म्यूचुअल फंड उद्योग को जांच के दायरे में लाया गया था।

सेबी के नए नियमों के मुताबिक, लिक्विड म्यूचुअल फंड योजनाओं को अपने फंड का कम से कम 20% लिक्विड एसेट्स जैसे सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश करना होगा। उन्हें किसी भी एक क्षेत्र में अपनी कुल संपत्ति का 20% से अधिक निवेश करने से निषेध किया जाएगा; वर्तमान सीमा 25% है। हाउसिंग फाइनेंस जैसे क्षेत्रों के लिये यह सीमा 10% रहेगी।

इन उपायों का उद्देश्य उन स्थितियों को रोकना है जैसे कि वर्तमान में देखी जा रही हैं। जबकि सरकारी प्रतिभूतियों में अनिवार्य निवेश तरलता का एक माध्यम सुनिश्चित करेगा, विशिष्‍ट व्‍यवसायिक क्षेत्रों में निवेश पर कसी गई लगाम निधियों को अनुशासन में रखेगी उन्हें अपने जोखिमों या निवेशों में विविधता लाने के लिए मजबूर करेगी। कुछ म्यूचुअल फंड्स ने उन कंपनियों के साथ ‘गतिरोध समझौतों (standstill agrements) में करार किया, जिनके ऋण लिखत (debt instruments) में निधियों का निवेश किया गया था। यह एक स्वागत योग्य कदम नहीं है और म्यूचुअल फंड के निवेशकों के हितों के खिलाफ है। सेबी ने इस तरह के गतिरोध समझौतों में निवेश करने पर प्रतिबंध लगाकर सही काम किया है। इसके अलावा, सेबी ने यह आवश्यक किया है कि उनके निवेश के मूल्य को बेहतर ढंग से दर्शाने के लिए म्युचुअल फंडों की संपत्ति का मार्क-टू-मार्केट आधार (mark-to-market basis) पर मूल्‍यांकन किया जाए।

जबकि वित्तीय प्रणाली के अंदर के जोखिमों से निपटने के लिए सेबी का इरादा सराहनीय है, नियामक के इन कार्यों के अनपेक्षित परिणाम भी हो सकते हैं, जिनकी चौकसी रखना आवश्यक है। सेबी द्वारा समावेश किए गए नए नियमों में से एक है, शोधन (redemption) की अचानक मांग को हतोत्साहित करने के लिए लिक्विड म्यूचुअल फंड में अल्पकालिक निवेश पर एग्जिट लोड (exit load) बढ़ाना। यह संभवतः बॉन्ड बाजार में निधियों के प्रवाह में बाधा बन सकता है, जो कि शेष विश्‍व की तुलना में भारत में पहले से ही अपर्याप्त रूप से विकसित (undeveloped) है। जबकि बाजारों और बिचौलियों को अनुशासित करने में सेबी एक सराहनीय काम कर रहा है, बड़ा सवाल यह है कि क्या नियामक वास्तव में एक निश्चित बिंदु से परे जाकर निवेशकों को सुरक्षा प्रदान कर सकता है। बाजार निवेश में जोखिम शामिल है, और उच्च प्रतिलाभ (high returns) प्राप्त करने की इच्‍छा रखने वाले निवेशक वास्तव में ऐसे निवेश के साथ सम्‍बद्ध बढ़ते जोखिमों को स्‍वीकार करने के लिए तैयार हो सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त, नियामक शायद जिस बारे में अधिक चिंतित है, वह हैं चूक के तरंग-प्रभाव (ripple effect of defaults) और व्‍यवस्‍था का लुढ़क जाना (roll-overs on the system)। ऐसी चूकों (defaults) से निवेशक का आत्मविश्वास डगमगा सकता है और इससे अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा। इस दृष्टिकोण से देखने पर, नियामक के नवीनतम नियमों का स्वागत किया जाना चाहिए।

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